Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verses 27–30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 7, verses 27–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 27-30
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
भ्रमस्य जागतस्यास्य जातस्याकाशवर्णवत् ।
अत्यन्ताभावसंबोधे यदि रूढिरलं भवेत् ॥ २७ ॥
तज्ज्ञातं ब्रह्मणो रूपं भवेन्नान्येन कर्मणा ।
दृश्यात्यन्ताभावतस्तु ऋते नान्या शुभा गतिः ॥ २८ ॥
अत्यन्ताभावसंपत्तौ दृश्यस्यास्य यथा स्थितेः ।
शिष्यते परमार्थोऽसौ बुध्यते जायते ततः ॥ २९ ॥
न विदः प्रतिबिम्बोऽस्ति दृश्याभावादृते क्वचित् ।
क्वचिन्नाप्रतिबिम्बेन किलादर्शोऽवतिष्ठते ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म प्रमाणों द्वारा नहीं ज्ञात होता“ इस कथन की सिद्धि नहीं होती, क्योकि यदि प्रतिबन्धक
नहो, तो महावाक्य द्वारा उसका ज्ञान होता है । प्रतिबन्धक का नाश तो ब्रह्म में अध्यस्त द्वैत
मिथ्यात्व ज्ञान से ही होता है, क्योकि जहाँ पर रज्जु में सर्प का भ्रम होता है, वहाँ पर जब तक
सर्प का निषेध न हो तव तक रज्जु का ज्ञान नहीं हो सकता, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी बोले :
हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे रूपहीन आकाश में नील, पीत आदि रूप देखे जाते हैं, वैसे ही
चिन्मय ब्रह्म में यह जगत्-भ्रम उत्पन्न हुआ । उक्त जगद्भ्रम के अत्यन्त अभाव के ज्ञानमें
यदि अत्यन्त दृढता हो तभी ब्रह्म का पूर्वोक्त रूप ज्ञात होता है, अन्य कर्म से नहीं । दृश्य के
अत्यन्त अभाव के सिवा दूसरी कोई उत्तम गति नही हे । “यथास्थितेः यानी नाश आदि
विकार के बिना ही अपने अधिष्ठानमें मिथ्यात्व को प्राप्त होनेवाले इस दृश्य जगत् का अत्यन्त
अभाव होने पर जो अवशिष्ट रहता है, उस परमार्थ वस्तुका बोध होता हे; बोध होने से वह
बोद्धाका आत्मा ही हो जाता हे । दृश्य जगत् के अभाव के बिना चिन्मय ब्रह्मका बुद्धिमें प्रतिबिम्ब
कभी नहीं पड़ सकता ब्रह्म बुद्धि में प्रतिबिम्बित होकर अपना आवरण करनेवाले अज्ञानका
नाश कर तात्त्विकरूप से प्रतीत होता है । अध्यस्त द्वित प्रपंचको सत्य समझनेवाली बुद्धि में
ब्रह्मका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता, क्योकि विरोधी द्वैत से आक्रान्त बुद्धिमें अद्वैत का प्रतिबिम्ब
पड़ना संभव नहीं हे