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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verses 6–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 7, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । चिन्मात्रं चेतनं विश्वमिति यज्ज्ञातवानसि । न किंचिदेव विज्ञातं भवता भवनाशनम् ॥ ६ ॥ चेतनं राम संसारो जीव एष पशुः स्मृतः । एतस्मादेव निर्यान्ति जरामरणभीतयः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

यह कर्ता क्विप प्रत्यय नहीं है, किन्तु भाव में (चेतनम्‌-चित्‌-ज्ञान) क्विप्‌ प्रत्यय है। ऐसी परिस्थिति में उक्त दोषके लिए अवसर नहीं है अर्थात्‌ उक्त जगत्‌ को चेतनाश्रय सर्वसाधारण लोग जानते है, पर ज्ञानरूप (ब्रह्मरूप) नहीं जानते, इसलिए उपदेश की आवश्यकता है; इस अभिप्राय से श्रीवस्रिष्ठजी पूर्वोक्त विकल्प की निन्दा करते हैं । वत्स श्रीरामचन्द्रजी, आपने जो विश्व को चिन्मात्र अर्थात्‌ चेतन जाना है, ऐसी दशामें आपने भवभीतिनाशक कुछ भी उपाय नहीं जाना, क्योकि कर्तामें क्विप्‌ प्रत्यय से निष्पन्न चित्‌ और चेतन शब्द समानार्थक ही हैं, कारण कि नन्द्यादिल्युट्‌ प्रत्यय भी कर्ता में ही होता है। उनका अर्थ होता है-चितिकर्ता । नित्य चितिमें कर्तृत्वका सम्भव नहीं है, इसलिए अनित्य मनोवृत्तिमें प्रतिफलित चित्‌ का ग्रहण करनेपर उसके आश्रयभूत अन्तःकरण को आत्मा समझनेवाला जीव ही चित्‌शब्द से कहा गया है । वह बहिर्मुख होने से विषयों को ही सार पदार्थ समझता है, अतएव पशु है, इससे ही जन्म, मरण आदि भय भीतर बैठे हुए- से बाहर निकलते हैं