Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 7, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
पशुरज्ञो ह्यमूर्तोऽपि दुःखस्यैवैष भाजनम् ।
चेतनत्वाच्चेतनीयं मनोऽनर्थः स्वयं स्थितः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि जीव मूर्तस्थूल शरीर से अतिरिक्त है । मूर्तस्थुलशरीरातिरिक्तत्वेन
उसके ज्ञान से ही जरा, मरण आदि का विनाश हो जायेगा, क्योकि ˆअशरीरं वाव सन्तं परियाप्रिये
५६ यह सामान्य अभिव्यक्ति से शरीर में और विशेषरूप से शरीर के अन्दर हृदयकमल में
भलीभाँति अभिव्यक्त होता है ।
न स्पृशतः“ (शरीररहित उसको प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं करते) ऐसी श्रुति है, इस शंका
पर कहते हैं।
बहिर्मुख होने के कारण बाह्य विषयों को ही सार समझनेवाला यह जीव मूर्तस्थूल शरीर से
शून्य होता हुआ भी कृतकृत्य नहीं होता, क्योकि अज्ञानी है, स्वयं चेतनीय मनरूप और
अनर्थरूप बनकर स्थित हे, अतः यह दुःख का ही भाजन हे