Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 14–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
शून्यसिद्धार्थसविका रन्ध्रानीलमयाऽरवा ।
अदृश्यया जीवसूच्या संततानुसृता स्थिता ॥ १४ ॥
कलाकलनधर्मिण्या वासनामात्रसारया ।
क्षीणदीपांशुसूचीवत्तीक्ष्णयानुपलभ्यया ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अत्यन्त अलक्ष्य होने के कारण ही मानों वह
शून्यवादियों के मत में प्रसिद्ध अर्थो की जननी ओर आकाश की जो नीलिमा है, तद्रूप थी ओर
निःशब्द थी । इस प्रकार लोहसूचिकाका वर्णन कर अब रोगरूपिणी सूचिका उसका अनुसरण
करती है । उस लोहरूप सूचिका का अदृश्य ओर जीवयुक्त रोगरूपिणी सूचिका, जो कि तत्-
तत् पदार्थाकार मनोवृत्तिमें प्रतिफलित चिदाभास के समान धर्मवाली थी, सदा अनुगमन
करती थी । जैसे विनाशावस्था को प्राप्त सूक्ष्म दीपज्योति दृष्टिगोचर नहीं होती ओर स्पर्श
करने पर उसके अन्दर तीक्ष्ण दाहक शक्ति प्रतीत होती है, वैसे ही यद्यपि वह सूचीभाव को
प्राप्त हुई राक्षसी अत्यन्त अदृश्य थी, फिर भी उसके अन्दर वासना आदि ज्यों-की-त्यों
विद्यमान थी, उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ था