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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 34–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

कस्यचिद्विवशाङ्गस्य क्षीणस्य विपुलस्य च । प्रविश्यान्तर्वातसूचिर्भवत्यतिविषूचिका ॥ ३४ ॥ कस्यचित्तनुदेहस्य स्वस्थस्य सुधियोऽपि वा । प्रविश्य जीवसूचित्वे भवत्यन्तर्विषूचिका ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि तपस्या से पवित्र हुई उस राक्षसी ने दूसरे लोगों को पीड़ा पहुँचानेवाले सूचीरूप शरीर की प्रार्थना क्यो की ? अर्थात्‌ ऐसी प्रार्थना उसके लिए योग्य कैसे हो सकती है ? इस पर कहते हैं। पुण्यशरीरवाले जीवों की भी जाति के उचित वासना शान्त नहीं होती । इसीलिए सूक्ष्म सूचीरूपी पिशाचीत्व का कर्कटी ने उपार्जन किया ॥ ३ २॥ उसके दिशा-विदिशामें घूमनेपर उसकी सर्वसाधारण कर्कटीदेह को, जो कि अविद्या से कल्पित थी, महावायुओं ने शरत्कालीन मेघ के समान छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया ॥ ३ ३॥ अब विसूचिका का चरित्र विस्तारपूर्वक कहते हैं। जो कोई जीव पहले किसी रोग से आक्रान्त होने के कारण क्षीणकाय हुआ हो या विशालकाय हुआ हो उसके अन्दर प्रवेश करके वायु में छिपी वह लोहसूची भयंकर विसूचिकारूप रोग में परिणत हो जाती है । किसी लघुकाय, स्वस्थ ओर बुद्धिमान्‌ पुरूष के अन्दर जीवयुक्त सूचिकारूप से प्रवेश करके दुर्बुद्धिरूपा हो जाती है