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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 36–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verses 36–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 36,37

संस्कृत श्लोक

एवं क्वचित्तृप्यति सा दुर्बुद्धिहृदयास्थिता । क्वचिदुच्छेद्यते पुण्यैर्मन्त्रौषधितपःक्रमैः ॥ ३६ ॥ आसीद्बहूनि वर्षाणि भ्रमणैकपरायणा । देहद्वयेन गच्छन्ती व्योम्नि भूमितले तथा ॥ ३७ ॥ रजस्तिरोहिता भूमौ हस्तेऽङ्गुलितिरोहिता । प्रभातिरोहिता व्योम्नि वस्त्रे सूत्रतिरोहिता ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार किसी पुरूष में दुर्बुद्धिरूप से हृदय में स्थित होकर तृप्त होती हे ओर किसी पुरुष में मन्त्र, ओषधि, तप आदि पुण्य उपाय से उसकी निवृत्ति की जाती हे । दोनों शरीरो से आकाश और भूमितल में जाती हुई वह बहुत वर्षो तक इधर उधर घूमती रही