Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 39–46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verses 39–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
अन्तःस्थस्नायुसरिति दुर्भगे पांशुपाण्डुरे ।
शुष्करेखासरित्खाते सूक्ष्मरेखाजरत्तृणे ॥ ३९ ॥
अर्थहीने गतच्छाये शून्या उच्छ्वासकारिणी ।
मक्षिकावातहरिते श्रीवृक्षपरिवर्जिते ॥ ४० ॥
स्थूलास्थिग्रन्थिवलिते नित्यकम्पस्फुरत्तमे ।
अनात्मीयाच्छनीहारेऽशुद्धांशुककृतभ्रमे ॥ ४१ ॥
किणस्थाण्वङ्गविश्रान्तमक्षिकापिकवायसे ।
रौक्षरूढरसद्वाते विलोलाङ्गुलिशाखिनि ॥ ४२ ॥
मालाभ्रलेखासंसारे स्वाङ्गुलिव्रणगर्तके ।
स्पन्दावश्यायपृषति पदवल्मीकपर्वते ॥ ४३ ॥
कचत्याशु जलभ्रान्तौ नखाजगरकर्कशे ।
क्वाचित्कविसरद्भीतभीतयूककुपान्थके ॥ ४४ ॥
विरूपाशुष्कसंदष्टवीटिकापूतिपल्वले ।
मध्यस्थलेखमार्गौघशीतश्वसनगोचरे ॥ ४५ ॥
ग्रस्तयूकानरौघासृक्पूर्णसृक्किनखास्यताम् ।
दधताङ्गुष्ठपक्षेण क्रान्ते सर्वत्र यायिनी ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके तिरोधान का स्थान कहते है ।
भूमि में वह धूलिकणों से तिरोहित रहती है, हाथ में अंगुलियों से तिरोहित रहती है,
आकाश में प्रभा से तिरोहित रहती है और वस्त्रमें सूत से तिरोहित रहती है ॥ ३ ८॥
देह के बीच में भी इसके तिरोधान के स्थान कहते हैँ ।
देह के अन्दर स्थित आँतरूपी नदी में, व्यभिचार आदि दोष से दुष्ट उपस्थेन्द्रिय में,
ऊसर आदि भूमि के धूलिकणों से धूसर अंगों मे, हस्त, पाद आदि की रेखारूपी सूखी नदीके
गङ्ख मे ओर छोटे-छोटे रोमरेखारूपी पुराने तृणों में तिरोहित रहती है