Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
नानाविरचनाचित्रपटपत्तनगामिनी ।
गमागमपरिश्रान्ता तत्रात्यन्तचिराध्वगा ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
पीडित लोगों
को उच्छ्वसित करनेवाली ओर अन्दर सद्भाव से रहित वह विसूचिका सौभाग्य से हीन ओर
कान्तिरहित शरीर में, मक्खियों, रूक्ष दुर्गन्धवायुओं से युक्त हरे तृणों से आवृत्त देश में
तथा विल्व, आम्र आदि श्रेष्ठ वृक्षों से रहित देश में रहती हे । पशु, मनुष्य आदिकी बड़ी-
बडी हड्डियों से व्याप्त, आँधी आदि से नित्य कम्पन होने के कारण अत्यन्त स्फुरित होनेवाले,
आत्मनिष्ठ अतएव निर्मल तथा हिम के समान दूसरों का सन्ताप हरनेवाले सत्पुरुषो से रहित
मेले, कुचैले ओर अपवित्र वस्त्रवाले अशिष्ट लोगों के संचार में आनेवाले देश में, जहाँ पर
खोखलों मे और काटे हुए वृक्षों के अग्रभाग में क्रमश: मधुमक्खियाँ और कोयल, कौए निवास
करते हैं, अत्यन्त शीत होने के कारण रूक्ष तेज हवा सांय-सांय शब्द करती है, अतएव
कम्प के कारण अंगुलिरूपी शाखाएँ चंचल रहती हैं तथा जहाँ पर घनीभूत कुहरे का संचार
रहता है ऐसे स्थानों में, जिनकी अंगुलियाँ कटने के कारण व्रणपूर्ण हैं ऐसे लोगों के
निवासस्थानो में, जहाँ पर हिमकण पिघलते रहते हैं, लोगों के पैरों के चिह्नों में युक्त स्थान
में, बामियों मे, पर्वतो में, जहाँ पर जलभरान्ति होती है, ऐसे मरुप्रदेशों में, नखप्रधान बाघ,
भालू आदि में तथा अजगर आदि में भीषण जंगलों में, जहाँ पर इधर उधर भाग रहे अत्यन्त
भयभीत और जुओं से गर्हित बटोही लोग रहते हैं उन प्रदेशों में, कुत्सित स्वरूपवाले एवं
सूखे हुए शरीरवाले पिशाच आदिसे पान के बीड़ों के समान चबाए गये पुराने पत्तों से भरे हुए
ओर दुर्गन्धियुक्त जल के गङ्ख में, जिन मार्गों के बीच में कुल्या (नहर) आदि के गड़ों में
रहते हैं, शीत वायु से पूर्ण पथिकों के विश्राम-स्थान में, चबाये जुओं के पेटमें स्थित मनुष्यों
के रक्त से जिनके ओठ भरे हैं, ऐसे जंगली मनुष्य, वानर आदि के नखरूपी मुखवाले
अंगुलिसमूह से आक्रान्त सम्पूर्ण देहप्रदेशमें तथा भूमि के पूर्वोक्त भिन्न-भिन्न स्थानों में
वह जाती थी ॥ ४ ०-४ ६॥ जिन नगरों में अनेक प्रकार की हाथी, घोड़े आदि की रचना चित्र-
विचित्र वस्त्र रहते हैं, उन नगरों मे वह जाती थी और वहाँ अत्यन्त लम्बे मार्ग मे गमनागमन
से वह परिश्रम को प्राप्त होती थी