Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
नगरानगरे व्यस्तसूत्रभाण्डैकभारिणी ।
तप्ते कलेवरारण्ये बलीवर्दापवर्तिनी ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
सूचिकास्वभाव होने के कारण वह नगरों में और
गाँवों में सड़कों और गलियोंमें फेंके हुए यानी अव्यवस्थितरूपसे पड़े हुए कपास के सूतों
और उनमें गुँथे हुए काँचमणि आदि अलंकारो को केवल धारण (ग्रथन) करती थी और ज्वर
आदि से पीड़ित प्राणियों के शरीररूपी वन में साँड के समान विहार करती थी यानी जैसे
हृष्टपुष्ट साँड अपने सींगों से बामी आदि को खोदता हुआ इधर-उधर घूमता है, वैसे ही
वह सूचिका भी मनुष्य के शरीर का उन्मथन करती हुई घूमती थी