Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
गुप्ता विश्रमणायैव मनाक्करपरिच्युता ।
तन्तुप्रोता मुखाकृष्टिः खिन्ना क्वापि विलीयते ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे किसीके द्वारा
सीने के लिए हाथ में ली गई चिरकाल तक सीने के लिए पिरोये हुए धागे को मुख से
खींचनेवाली सुई मानों थककर थोड़ी देर के लिए सीनेवाले के हाथ से गिरी हुई विश्राम करने
के लिए कहीं अलक्षित होकर लीन हो जाती है, वैसे ही यह सूचिका भी थी