Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
परपूररसेनैव सूच्या हृत्सुविकासितम् ।
अनारतपतत्सूक्ष्मसूत्रान्त इव स्तम्भिता ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
सूचीने पहले
भी दूसरे लोगों के वध से होनेवाले उदरपूर्ति की इच्छा से ही तपसे क्लेश को प्राप्त हुए
अपने मन को उल्लसित किया था, इसलिए मानों वह निरन्तर मुख में गिर रहे अपने
इच्छित सूक्ष्म तागे में स्तम्भित रहती थी