Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
तीक्ष्णैरपि चिरक्षीणं पूर्यते निर्विचारणा ।
दृष्टान्तोऽत्र क्षणात्सूच्या पूरितो जर्जरः पटः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
अब सूची द्वारा मूर्खतापूर्वक किया गया तप तागे से गिरे हुए चीथडों को पिरोने के लिए ही
हुआ, अपने उदरपूरण के लिए नहीं हुआ यह उत्प्रेक्षापूर्ण अर्थ जो कहा गया था, वह लोकप्रसिद्ध
सामान्योक्तिका दृष्टान्त हो गया, ऐसा कहते हैं ।
चिरकाल से दरिद्रता, कृशता आदि से परिपीड़ित कुल को क्रूर लोग भी दया से पुष्ट करते
हैं, इस विषय में विचार करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है, यहाँ इस अर्थ में दृष्टान्त सूची
द्वारा भरा गया जीर्ण शीर्ण वस्त्र प्रत्यक्ष देखा गया हे