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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 61

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 61

संस्कृत श्लोक

कण्ठवस्त्रदलप्रोता वेधाक्ष्णा मुखमीक्षते । कथमेता भिनद्मीति तीक्ष्णानामेतदीप्सितम् ॥ ६१ ॥

हिन्दी अर्थ

किसी समय गले में लटकाये गये दुपट्टे के सूतमें पिरोई गई वह अपने छेदरूपी नेत्र से स्त्रियोंका मुख “इनका कैसे भेदन करु" इस अभिप्राय से देखती हे । जो लोग क्रूर होते हैं, उनकी एकमात्र यही अभिलाषा रहती हे