Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 74–76
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verses 74–76 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 74-76
संस्कृत श्लोक
पादप्रविष्टा रुधिरपानोपार्जनविस्मिता ।
तुष्यत्यतितरां गुच्छभोजना तुच्छभोजनैः ॥ ७४ ॥
शेते कर्दमकोशस्था चिरकालमधोमुखी ।
इच्छानुरूपमासाद्य क इवास्पदमुज्झति ॥ ७५ ॥
क्रौर्येणापहतात्मानं दर्शयत्युपवेधनैः ।
उत्सवादपि नीचानां कलहोऽपि सुखायते ॥ ७६ ॥
हिन्दी अर्थ
पैर में घुसकर रक्तपान के उपार्जन से सन्तुष्ट होती है, फूलों के
गुच्छों की माला पिरोने के समय अधिक भोजन करनेवाली भी अल्प भोजन से तृप्त हो जाती
है। मलपंकयुक्त मूलाधार कोशमें बैठी हुई चिरकालतक नीचे मुख करके सोई रहती है, अपने
इच्छानुरूप स्थान को पा कर कौन फिर उसे छोड़ सकता है ? क्रूरता से दूसरों के प्राणहरणपर्यन्त
वेधनों से अपने को दूषित दिखलाती है।
शंका - यदि उसका कोई स्वार्थ नहीं था, तो उसकी अन्य लोगों के मारण में प्रवृत्ति क्यों
हुई ?
समाधान - नीच लोगों को कलह करना उत्सव से भी अधिक सुखदायी होता है। भाव यह
कि जिन दुष्टों को दूसरों को पीड़ित करने की सामर्थ्य न होने पर भी दूसरों से कलह करने में
सुख होता है, उनको दूसरे को मारने में सुख हो, इसमें तो कहना ही क्या है ?