Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 77
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verse 77 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 77
संस्कृत श्लोक
कपर्दकार्धलाभेन कृपणो बहु मन्यते ।
दुरुच्छेदा हि भूतानामहंकारचमत्कृतिः ॥ ७७ ॥
हिन्दी अर्थ
थोड़े से रक्तकर्णो के आस्वाद के लोभ से इसकी दूसरों को मारने में प्रवृत्ति हो सकती
है ? इस पर कहते हैं।
आधी कोड की प्राप्ति से भी कृपण को बड़ा हर्ष होता है, प्राणियों का अहंकार-चमत्कार
दुरुच्छेद्य है, यानी उसका विनाश नहीं किया जा सकता