Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 9–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
सुमुखग्राह्यरूपेण श्लक्ष्णपुच्छशिखाणुना ।
तदा वैपुल्यशान्त्यर्थं परं मौनव्रतं गता ॥ ९ ॥
सुदूराद्दीपवदृष्टं खतन्मात्रत्वमागता ।
दूरादेव मनोज्ञेन प्रोद्गिरन्ती मुखेन खम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
सूक्ष्म पुच्छाग्र से
अणु (परमाणु के सदृश) मुख की प्रसन्नतापूर्वक वरदान से प्राप्त होनेवाले अत्यन्त अभीष्ट
अपने सूचीरूप के लिए पूर्व के अपने विशाल शरीर की निवृत्ति हो, इसलिए मानों उसने पहले
मुनि की तपस्या की थी, दूरसे देखने पर खूब प्रकाशित हो रहे नेत्रों की सन्धिका ज्ञान न होने
से एक दीप के समान देखी गई वह, सूचीरूप शरीर का दर्शन न होने से, केवल आकाशरूपता
को प्राप्त हुई थी । पहले विपुल देहावस्था में जो आकाश उसने निगल रक्खा था, देह में स्थित
उस आकाश का सूक्ष्म शरीर की प्राप्ति होने पर अपने मनोज्ञ मुख से मानों वमन कर रही
थी