Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verses 1–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 71, verses 1–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 1-10
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ सा बहुकालेन कर्कटी नाम राक्षसी ।
सर्वेषां नरमांसानां नतु तृप्तिमुपाययौ ॥ १ ॥
पूर्वेणैव किलाह्ना सा तृप्ता रुधिरबिन्दुना ।
सूच्याः किमिव मात्यन्तस्तृष्णासूची सुदुर्भरा ॥ २ ॥
चिन्तयामास हा कष्टं किमहं सूचिता गता ।
सूक्ष्मास्मि हतशक्तिश्च अपि ग्रासो न माति च ॥ ३ ॥
क्व मे तानि विशालानि गतान्यङ्गानि दुर्धियः ।
कालमेघविशालानि वने शीर्णानि पर्णवत् ॥ ४ ॥
मय्यस्यां मन्दभाग्यायां मनागपि न माति हि ।
स्वादुमांसरसग्रासो वसावासित आसयन् ॥ ५ ॥
पङ्कान्तर्विनिमज्जामि पतामि धरणीतले ।
हस्तास्मि जनपादौघैः शुक्रेण मलिनास्मि च ॥ ६ ॥
हा हताहमनाथाहमनाश्वासा निरास्पदा ।
दुःखाद्दुःखे निमज्जामि संकटात्संकटेऽपि च ॥ ७ ॥
न सखी न च मे दासी न मे माता न मे पिता ।
न मे बन्धुर्न मे भृत्या न मे भ्राता न मे सुतः ॥ ८ ॥
न मे देहो न मे स्थानं न मे कश्चित्समाश्रयः ।
नैकस्थाने समावासो भ्राम्यामि वनपर्णवत् ॥ ९ ॥
आपदां धुरि तिष्ठामि निविष्टास्मि सुदारुणे ।
अभावमपि वाञ्छामि सोऽपि संपद्यते न मे ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, इसके बाद वह कर्कटी नामकी राक्षसी चिरकालतक
सब जाति के मनुष्यों के मांसों का आस्वादन करनेपर भी तृप्ति को प्राप्त नहीं हुई, यों तो
पहले ही दिन एक रुधिरविन्दु से वह तृप्त हो गई, क्यों कि सूचिके भीतर कितना समा सकता
हे ? किन्तु तृष्णापूर्ण उस सूचीका मरना अत्यन्त कठिन हे । उसने विचार किया कि बड़े खेद
की बात है, मैं क्यों सूची बनी, मैं बहुत छोटी हूँ, मेरी खाने की शक्ति अतिअल्प है, एक ग्रास
भी मेरे पेटमें नहीं समाता, में बडी दुर्बुद्धि हूँ, मेरे वे विशाल अंग कहाँ गये, काले मेघ के समान
विशाल वे मेरे अंग वन में पत्ते के समान विलीन हो गये । इस मन्दभाग्या मुझ में वसा से
सुगन्धित स्वादु मांसरस का ग्रास थोड़ा भी नहीं समाता । मैं कीचड़ के अन्दर डूब जाती हूँ.
और पृथ्वीमें गिर जाती हूँ, मनुष्यों के पैरों के समूहों से कुचली जाती हूँ ओर शुक्र से मलिन हूँ;
मैं मारी गई हूँ, मैं अनाथ हूँ, मुझे आश्वासन देनेवाले मित्र, बन्धु आदि नहीं है, मेरा कोई
आधार नहीं है, मैं एक दुःख से दूसरे दुःख में और एक संकट से दूसरे संकट में पड़ती रहती हूँ,
न मेरी कोई सखी है, न कोई मेरी दासी है, न मेरी माता है, न मेरा पिता है, न मेरा बन्धु है, न
मेरे नौकर चाकर हैं, न मेरा भाई है, न मेरा पुत्र है, न मेरा शरीर है, न रहने का स्थान है, न कोई
उपजीव्य है और न एक स्थान में मेरा आवास ही है । मैं वन के जीर्ण-शीर्ण पत्ते के समान
घूमती फिरती हूँ, मैं आपत्तियों के सम्मुख खड़ी रहती हूँ, अत्यन्त भीषण स्थानों में प्रविष्ट हूँ,
मैं चाहती हूँ कि मैं मर जाऊँ, पर वह (मृत्यु) भी मुझे प्राप्त नहीं होती
सर्ग सन्दर्भ
सत्तरवाँ सर्ग समाप्त इकहत्तरवाँ सर्ग सूचिकारूप को प्राप्त होकर अपने पूर्व शरीर का स्मरण कर रही कर्कटी के पश्चात्ताप का विस्तारपूर्वक वर्णन ।