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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 71, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

विविक्तमनसां बुद्धौ क्व स्फुरन्ति हताशयाः । ग्राममार्गतृणानीव गिरेरुपरिवासिनाम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि स्थूलवर्शी पुरुष तुम्हारा उद्धार करने में समर्थ नहीं है, क्योकि तुम उनके दृष्टिगोचर नहीं हो सकती, किन्तु यूक्ष्मदर्शी योगी तुम्हारा उद्धार करेंगे, ऐसी यदि कोई शंका करे, तो उस पर कहती है । जैसे पर्वत के उपर रहने वाले लोगों की बुद्धि में ग्राममार्ग के तृणों का स्फुरण होना सम्भव नहीं है, वैसे ही सूक्ष्मदर्शी योगियों की बुद्धि में मेरे जैसे हतभाग्य लोगों का स्फुरण कैसे हो सकता है ?