Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 71, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
क्व किलाञ्जनशैलाभं वपुर्भरितदिक्तटम् ।
क्व प्राचिकाखुरसमं सूचित्वं तृणपेलवम् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
कहाँ अंजनपर्वत के सदश दिक्-तटों को पूर्ण करनेवाला मेरा वह विशाल शरीर ओर
कहाँ मकड़ी की टाँगों के समान सूक्ष्म और तिनके के समान कोमल यह सूचिता ? अर्थात्
दोनों शरीरो मेँ महान् अन्तर है