Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 71, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
हा वक्षः काचवैधुर्यगिरीन्द्रतटसुन्दर ।
नाद्य सिंहादि यौकं तद्धृतं रोमवनं तथा ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
काँचमणियों
की मालाओं से शून्य होने पर भी हिमालय के तटके समान सुन्दर हे मेरे वक्षस्थल, तुमने
आज वह रोमों का वन नहीं धारण किया, जिस में सिंह आदि बड़े-बड़े जानवर जुओं के
समान प्रतीत होते थे, इसलिए मुझे तुम्हारे लिए खेद है