Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 72, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
ततो महेन्द्रप्रहितं वातनुन्नामिषं रजः ।
तया त्वभ्रत्वव्याजेन न निगीर्णं मुखे विशत् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भाग्यवश उसके छेद में वायु से प्रेरित माँस आदि के अपवित्र कणों के प्रवेश की इन्द्र द्वारा
किये गये विध्नरूप से ओर प्रविष्ट हुए उनका जो बहिर्गमन है, उसकी उसके अनिगरणरूप से
उत्प्रेक्षा करते हैं ।
तदनन्तर इन्द्र द्वारा भेजे गये और वायु से प्रेरित आमिष (मांस) के कण को, जो कि
उसके छिद्ररूपी मुख में प्रविष्ट हो रहा था, उसने नहीं निगला