Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 72, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
प्रसूतानि भविष्याणि गीर्वाणान्यानि वा चिरम् ।
कौसुमानि रजांस्यस्या इत्यास्यं पर्यपूरयन् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
भाग्यवश द्वुमलता आदि ने फूल के पराग से सूची के मुख को ढक दिया, ऐसी उत्प्रेक्षा
करते हैं ।
जो पहले उत्पन्न हुए थे, जो भविष्य में होंगे और जो देवताओं के लिए नहीं हैं वे सब
फूलों के पराग इस सूची को देने चाहिए, इस उत्साह से मानों पेड़, लता आदि ने उसके
मुख को भर दिया