Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 72, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
न पिबत्यास्यसंस्थानि तथा पुष्परजांस्यपि ।
विस्मयं पवनः प्राप सुमेरून्मूलनाधिकम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अपने मुँह
में स्थित फूल के परागों को भी वह नहीं पीती है, यह देखकर वायु को सुमेरूपर्वत को उखाड़ने
से भी बढ़कर आश्चर्य हुआ