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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verses 21–23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 72, verses 21–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 21-23

संस्कृत श्लोक

आशिरः पिहिता पङ्कैः पूरितापि महाजलैः । विधूतापि बृहद्वातैर्दग्धापि वनवह्निभिः ॥ २१ ॥ भिन्नापि करकापातेर्भ्रामितापि तडिद्भ्रमैः । उद्वेजितापि जलदैः क्षोभिताप्यतिगर्जितैः ॥ २२ ॥ अपि वर्षसहस्रैः सा चित्तस्थदृढनिश्चया । पादाग्रं तु कुसुप्तेव नाकम्पत तपस्विनी ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अन्य विध्नो से भी वह अपने कार्य से विचलित नहीं हुई, ऐसा कहते हैं। यद्यपि वह कीचड़ से सिर तक हजारों वर्षो तक ढकी गई थी, प्रचुर जल से हजारों वर्षो तक पूर्ण की गई थी, आँधी द्वारा वह हजारों वर्ष तक उड़ाई गई थी, वनाग्नि से हजारों वर्षो तक जलाई गई थी और ओले आदि के गिरने से तोड़ी फोड़ी गई थी, बिजली के तड़कने से हजारों वर्षो तक भ्रान्त हुई थी, मेघों से हजारों वर्ष तक क्षुभित की गई थी, तथापि दृढ़ निश्चयवाली वह तपस्विनी विषमूछसि सोई हुई की नाई अणुमात्र भी विचलित नहीं हुई