Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verses 21–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 73, verses 21–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 21-23
संस्कृत श्लोक
अदृश्ययाऽशरीरिण्या मनःपवनदेहया ।
कृतमाकाशरूपिण्या न तदस्ति न यत्तया ॥ २१ ॥
मत्तया शक्तयास्वादरसाच्चलितमेतया ।
कालमालानमाश्रित्य करिण्येव विवल्गितम् ॥ २२ ॥
कल्लोलबहुलाधूतदेहदृष्टनदीष्वलम् ।
वेगैर्वेधुर्यकारिण्या मत्तया मकरायितम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
अदृश्य, शरीररहित तथा
समष्टि और व्यष्टि के मन और पवनरूप देहवाली आकाशरूपी उस सूचीने जो न किया,
ऐसा कोई काम नहीं है, अर्थात् सभी उसने किया । यद्यपि वह सर्वत्र भ्रमण में समर्थ थी,
फिर भी कुछ प्राणियों के रक्त के आस्वाद के लोभ से मत्त हुई उसने प्राणियों के आयुष्य
के लिए नियत कालरूपी आलान स्तम्भ का (बन्धन स्तम्भ का) आश्रय ले कर हथिनी की
नाई थोडे से प्रदेश में भ्रमण किया । कल्लोल से (बड़ी-बड़ी लहरोंसे) खूब कँपाई गई
देहरूपी नदियों में बड़े वेग से प्राणियों का देह से वियोग करनेवाली उस मदोन्मत्त सूचिका
ने मगर के समान खूब आचरण किया