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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 73, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

अजोष्ट्रमृगहस्त्यश्वसिंहव्याघ्रादिनर्तितम् । नर्तक्येव चिरं रङ्गे वलयाङ्गदमङ्गके ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे नर्तकी रंग-स्थल में अपने शरीर में पहने हुए कंकण, बाजुबन्द आदि को नचाती है, वैसे ही उसने अपने द्वारा पीडित बकरी, ऊँट, हरिण, हाथी, घोडे, सिंह, बाघ आदि को चिरकालतक खूब नचाया