Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verses 33–35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 73, verses 33–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 33-35
संस्कृत श्लोक
अथ तृप्तस्य देहस्य स्मरणात्प्राक्तनस्य सा ।
बभूव दुःखितस्वान्ता पूर्णोदरसुखार्थिनी ॥ ३३ ॥
ततः प्राक्तनदेहार्थं करिष्ये विपुलं तपः ।
इति संचिन्त्य तपसे देशं निर्णीय सात्मना ॥ ३४ ॥
विवेशाकाशगृध्रस्य हृदयं तरुणस्य सा ।
प्राणमारुतमार्गेण खं खगीव बिलेशया ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके बाद अपने प्राक्तन तृप्त
शरीर के स्मरण से उदरपूर्ति से प्राप्त होनेवाले सुखको चाहनेवाली उस सूचीका हृदय
दुःखित हुआ । तदनन्तर अपने प्राचीन शरीर की प्राप्ति के लिए मैं कठोर तपस्या करूँगी,
ऐसा दृढ़ निश्चयकर, तप के लिए स्वयं देश का निर्णय कर वह आकाश में उडनेवाले जवान
गीध के हृदय में प्राणवायु के मार्ग से प्रविष्ट हुई, जैसे कि घोंसले मेँ सोनेवाली चिड़िया
घोंसले के छिद्र में प्रविष्ट होती है