Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verses 62–66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 73, verses 62–66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 62-66

संस्कृत श्लोक

शृङ्गमूर्ध्नि महत्युग्रे सारण्यानीमवाप ताम् । द्वितीयाकाशविततां वर्जितां प्राणिकर्मभिः ॥ ६२ ॥ असंजाततृणव्यूहां निकटत्वाद्विवस्वतः । रजोमयीमेव ततां संसाररचनामिव ॥ ६३ ॥ मृगतृष्णानदीसार्थपूरणीयाब्धितां गताम् । शक्रकोदण्डसंकाशमृगतृष्णासरिच्छताम् ॥ ६४ ॥ अमितानन्तपर्यन्तां लोकपालेक्षितैरपि । केवलं पवनस्पन्दप्रवहद्धूलिकुण्डलाम् ॥ ६५ ॥ सूर्यांशुकुङ्कुमालिप्तां लग्नचन्द्रांशुचन्दनाम् । विलासिनीमिव व्योम्नो वातसूत्कारपायिनीम् ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त ऊँची शिखर की चोटी में, जहाँ वह सूची तप कर रही थी, उस महावन में वह गया, वह महावन दूसरे आकाश के समान विस्तृत था ओर प्राणियों के संचार से रहित था । सूर्य के अति निकट होने के कारण उसमें तृण, लता आदि के समूह उत्पन्न ही नहीं हुए थे । वह रजोगुणमयी संसार-रचना के समान रजोमय था यानी धूली से भरा था । वह मृगतृष्णारूपी नदियों के समूह से पूर्ण होनेवाले समुद्र के तुल्य था, इन्द्रधनुष के तुल्य मृगतृष्णारूपी सैकड़ों नदियाँ उसमें थी, वह इतना विस्तीर्ण ओर असीम था कि लोकपाल भी (इन्द्र आदि भी) अपनी दृष्टि से उसकी सीमा जानने में असमर्थ थे ओर उसके अवान्तर देश अनेक थे, दोनों ओर जोर के वायु के यानी आँधी के चलने से बह रहे धूलिपटल ही उसके कुण्डल थे, सूर्य के किरणरूपी केसर से उसका सव गि लिप्त था और चन्द्रकिरणरूपी चन्दन उसमें लगा था, वह आकाश की विलासयुक्त नायिका के समान था ओर आकाश को वायुरूपी सूत्कार (कन्तके आलिंगन से जनित सुख को अभिव्यक्त करनेवाले ध्वनि) सुनाती थी