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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verse 67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 73, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

सप्तद्वीपसमुद्रमुद्रणसमुच्छन्नैकदेशाश्रयं भूपीठं परितो विहृत्य पवनो दीर्घाध्वना जर्जरः । तां प्राप्योग्रगिरिस्थलीमलिवपुर्व्योमाङ्गलग्नामिव व्याप्तानन्तदिगन्तपूरकबृहद्देहो विशश्राम सः ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

करके दीर्घमार्ग मेँ चलने के कारण थका था, अतः उसने भवर के समान शरीरवाले आकाश में लटकी हुई-सी उन्नत पर्वत स्थली को प्राप्त कर विश्राम लिया