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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 74, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तस्य तत्रोर्ध्वशृङ्गस्य तस्यां भुवि महावनौ । ददर्श मध्यमां सूचीं प्रोत्थितां सशिखामिव ॥ १ ॥ एकपादं तपस्यन्तीं शुष्यन्तीं शिरऊष्मणा । सततानशनां शुष्कपिण्डीभूतोदरत्वचम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जिसमें पूर्ववर्णित महान्‌ वन था, उस उन्नत शिखर की उस भूमि में उन्नत शिखर की मध्य शिखा के समान उठी हुई सूची को वायुने देखा । वह एक पैर से तप कर रही थी, अपने सिर की गर्मी से सूख रही थी और सदा निराहार थी तथा उसकी उदर-त्वचा मानों सूखे हुए पिण्ड के समान हो गई थी ।

सर्ग सन्दर्भ

तिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त चौहत्तरवाँ सर्ग उस तपस्विनी सूची को देखकर वायु का इन्द्र के समीप मेँ जाना, सूची को वर देने के लिए ब्रह्मा से इन्द्र की प्रार्थना और सूची के ज्ञान का वर्णन ।