Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 74, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
कौशेयरूपया सूच्या मेरुः स्थैर्येण निर्जितः ।
मज्जनं नैति वृद्ध्वैवं मुक्तमाद्यन्तयोर्दिने ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
रेशम के तार के समान अत्यन्त सूक्ष्म सूचीने अपनी स्थिरता से मेरू
को भी जीत लिया, उसके द्वारा जीता गया वह मेरु कहीं लज्जा से समुद्र में ड्ूबता तो नहीं है,
इस अभिप्राय से उसको देखने के लिए मानों दिन के आदि और अन्त भागों में उसने दीर्घता
धारण कर उसके दर्शन का त्याग किया । उसकी छायाने दोनों सन्ध्याओं में और रात्रिमें क्यों
उसके दर्शन का परित्याग किया, ऐसी यदि किसीको शंका हो, तो उस पर उपर्युक्त समाधान
है, यह समझना चाहिए