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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 74, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अरण्यान्येव दत्त्वार्थ चिरं जातशिखामिव । मूर्ध्न्यवस्थापितप्राणजटाजूटवलीमिव ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

वह पूर्वोक्त महाअरण्य द्वारा वृक्ष, लता, झाड़ियाँ, मृग आदि अपने विभवरूप पदार्थों को अन्य अरण्यों को देकर चिरकाल की तपस्या द्वारा सूचीरूप से पैदा की गई शिखा के समान स्थित थी । उसके बाद योग का परिपाक होने के कारण जिन्होंने अपने मस्तक में प्राणों को स्थापित किया है, ऐसे योगियों के जटाजूट की लटके समान वह स्थित थी