Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 74, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 74, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
तां प्रेक्ष्य पवनः सूचीं विस्मयाकुलचेतनः ।
प्रणम्यालोक्य सुचिरं भीतभीत इवागतः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ पर सूची की, तप के उपक्रम में अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण, उस्र महान् वन की
शिखा के रूप से उत्प्रेक्षा (तुलना) की गई है और चिरकाल के तप से उत्पन्न तेज की वृद्धि
होने पर पुंजीभाव की विवक्षा से उसकी महाअरण्य के जटाज़ूट के रूप से उत्प्रेक्षा की गई है।
उस सूची को देख कर वायु के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, उसको प्रणाम कर और
चिरकाल तक उसे देखकर अत्यन्त भयभीत की नाई वह उसके पास आया