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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 75, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 75, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ वर्षसहस्रेण तां पितामह आययौ । वरं पुत्रि गृहाणेति व्याजहार नभस्तलात् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, बोध होने के अनन्तर एक हजार वर्ष में ब्रह्माजी उसके पास आये । उन्होंने आकाश से “हे पुत्रि, तुम वरदान लो” - यह कहा

सर्ग सन्दर्भ

चौहत्तरवाँ सर्ग समाप्त पचहत्तरवाँ सर्ग ब्रह्माजी के प्रसन्न होने पर भी ज्ञान होने के कारण सूचीका वरलाभ के लिए चुपचाप रहना तथा ब्रह्माजी के वरदान से फिर उसकी देहप्राप्ति का वर्णन |