Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 75, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 75, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
प्रादेशः प्रथममभूत्ततोऽपि हस्तो व्यामश्चाप्यथ विटपस्ततोऽभ्रमाला ।
सोद्यत्स्वावयवलता बभौ निमेषात्संकल्पद्रुमकणिकाङ्कुरक्रमेण ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
मन की कल्पना के अनुसार स्थूल शरीर का आविर्भाव हुआ, यह कहते है ।
पहले बिलस्त भर हुई, फिर उसका आकार हाथ भरका हुआ, तदनन्तर पेड की शाखा के
तुल्य उसका शरीर बन गया, फिर वह मेघघटाकार हो गई, इस प्रकार वह सूची एक पलक भर
में अपने संकल्पवृक्ष की कणिका के (बीजके) अंकुरक्रम से जिसकी अवयवरूपी लता उत्पन्न
हो गई हो ऐसी बन गई