Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 75, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 75, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
तद्गात्राण्यविकलशक्तिमन्ति देहादुद्भूतान्यथ करणेन्द्रियाणि सम्यक् ।
संकल्पद्रुमवनपुष्पवत्समन्ताद्बीजौघान्यलमभवंस्तिरोहितानि ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके शरीर से अविकल शक्तिसम्पन्न तत् तत् अंग, इन्द्रियों
के गोलक, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियाँ, जो पहले तिरोहित बीजसमूहरूप थी, संकल्पवृक्षों के
वन के फूलों की नाई चारों ओर से भलीभाँति उत्पन्न हुई । मन की कल्पना से उत्पन्न होने के
कारण वे मिथ्या ही हैं, यह अर्थ हे