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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 76, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 76, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 76 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

निजमाकाशमासाद्य किंचित्प्रमुदिता सती । वृहद्राक्षसभावं तद्बोधात्कञ्चुकवज्जहौ ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

बद्धमूल बृहद्राक्षसभाव को केचुल के समान छोड दिया यानी जैसे साँप केंचुल छोड़ता है वैसे ही उसे छोड़ दिया