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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 76, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 76, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 76 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

तत्रैव ध्यायती तस्थौ बद्धपद्मासनस्थितिः । व्यालम्ब्य संविदं शुद्धां संस्थिता गिरिकूटवत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

निष्प्रपंच आत्मा का अपनी वृत्तिधारा द्वारा आश्रय लेकर बद्धपद्मासन से स्थिर और आत्मध्यान में परायण वह पर्वत के शिखर के समान वहीं पर बैठी रही