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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 76, Verses 6–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 76, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 76 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

अथ सा किं ग्रस इति चिन्तयामास चिन्तया । भोक्तव्यः परजीवश्च न्यायेन न विना मया ॥ ६ ॥ यदार्यगर्हितं यद्वा न्यायेन न समर्जितम् । तस्माद्ग्रासाद्वरं मन्ये मरणं देहिनामिदम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर चिन्तन हेतु मन से उसने विचार किया कि मैं किसे निगलूँ ? मुझे अन्याय के साथ दूसरे जीव का भोग नहीं करना चाहिए, जो सज्जनं द्वारा निन्दित है ओर जो न्यायोपार्जित नहीं है उस भोजन से देहियों के मरण को मैं उत्तम समझती हूँ