Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, Verses 27–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 77, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 27, 28
संस्कृत श्लोक
अपि नङ्क्ष्यामि देहेन नैव भोक्ष्ये गुणान्वितम् ।
सुखयन्ति हि चेतांसि जीवितादपि साधवः ॥ २७ ॥
अपि जीवितदानेन गुणिनं परिपालयेत् ।
गुणवत्संगमौषध्या मृत्युरप्येति मित्रताम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
भले ही मैं इस देह के साथ नष्ट हो
जाऊँ, पर गुणवान् को मैं नहीं खाऊँगी, क्योकि गुणवान् सज्जन लोग अपना जीवन देकर भी
लोगों के चित्त को सुख पहुँचाते हैं। अपना जीवन देकर भी गुणवान् लोगों के जीवनकी रक्षा
करनी चाहिए, गुणवान् लोगों की संगतिरूपी औषधि से मृत्यु भी मित्र बन जाता है