Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verses 1–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 78, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ सा राक्षसी रक्षःकुलकाननमञ्जरी ।
तमस्येवाभ्रलेखेव गम्भीरं विननाद ह ॥ १ ॥
नादान्ते समुवाचेदं हुंकारापरुषं वचः ।
गर्जितानन्तरं जातकरकाशनिशब्दवत् ॥ २ ॥
भो भो घोराटवीव्योमपदवीशशिभास्करौ ।
महामायातमःपीठशिलाकोटरकीटकौ ॥ ३ ॥
कौ भवन्तौ महाबुद्धी दुर्बुद्धी वा समागतौ ।
मद्ग्रासपदमापन्नौ क्षणान्मरणकोचितौ ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले यह
गुणवान् है या निर्गुण है, इस प्रकार गुण के सम्बन्ध का विचार कर तदनन्तर गुणीको अपने से
श्रेष्ठ समझ कर यदि वह गुणों से हीन हो, तो शास्त्रोक्त दृष्टि से भलीभाँति विचार कर उसको
शास्त्रोक्त दण्ड दे । यदि गुणों से अपने से वह श्रेष्ठ हो, तो उसे दण्ड न दे ॥३ ३॥
सतहत्तरवाँ सर्ग समाप्त
अठहत्तरवाँ सर्ग
भीषण वाक्यों से भी भयभीत न हुए राजा का कर्कटी को देखना और
मन्त्री द्वारा समझाई गई कर्कटी का प्रश्न करना |
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, तदुपरान्त राक्षस-कुलरूपी महावन की मंजरीरूप
वह राक्षसी अन्धकारमें मेघघटा के समान खूब जोर से गरजी । गरजने के बाद मेघगर्जन के
बाद वज़निर्घोष के समान शब्दतः (हुंकार से) भीषण होने पर भी अर्थतः अनिष्ठुर यह वचन
उसने कहा : अरे घोर अरण्यरूपी आकाशमार्ग में सूर्य और चन्द्रमा के सदृश तथा सब भूतों के
आधारभूत महामायारूपी अन्धकारपूर्ण गुफाके अन्दर बैठे हुए कीटों के समान तुम कौन हो,
तुम कोई महाबुद्धि हो या अल्पबुद्धि हो ? एक क्षणमें मेरे ग्रासको प्राप्त हुए मरणयोग्य तुम यहाँ
आये हो