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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, Verses 31–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 77, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

मृतिर्गुणितिरस्कारो जीवितं गुणिसंश्रयः । फलं स्वर्गापवर्गादि जीविताद्गुणिसंश्रितात् ॥ ३१ ॥ तस्मादिमौ परीक्षेऽहं कयाचित्प्रश्नलीलया । किंमात्रज्ञानकावेताविति तामरसेक्षणौ ॥ ३२ ॥ आदौ विचार्य सगुणागुणलेशयुक्तिं पश्चात्स्वतोऽधिकतरं च गुणैर्यदि स्यात् । कुर्यात्ततः समुपपत्तिवशेन दण्डं दड्यस्य युक्तिसदृशं घनसंभवेन ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

गुणी पुरुषों का तिरस्कार करना मरण है ओर गुणवान्‌ की संगति करना जीवन है । गुणिसंगतिरूपी जीवन से स्वर्ग, अपवर्ग आदि फल सिद्ध होते हैं, इसलिए कमल के समान नेत्रवाले इन लोगों में कितना ज्ञान है, यह जानने के लिए मैं इनकी कुछ प्रश्नों से परीक्षा करुगी