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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verses 30–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 78, verses 30–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

वचोवक्रेक्षणद्वारैर्धीमतामाशया मिथः । एकीभवन्ति सरितां पयांसि वलनैरिव ॥ ३० ॥ आभ्यां प्रायः परिज्ञातो मम भावोऽनयोर्मया । न विनाश्यौ मया चेमौ स्वयमेवाविनाशिनौ ॥ ३१ ॥ मन्ये भवेतामात्मज्ञौ नात्मज्ञानादृते मतिः । प्रमृष्टसदसद्भावाद्भवत्यस्तभया मृतौ ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

वचन, मुखदर्शन आदि से ज्ञानियों के अन्तःकरण परस्पर ऐसे एक हो जाते हैं जैसे कि नदियों के जल संगम से एक होते हैं