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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verses 33–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 78, verses 33–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 33,34

संस्कृत श्लोक

तदेतौ परिपृच्छामि किंचित्संदेहमुत्थितम् । प्राज्ञं प्राप्य न पृच्छन्ति ये केचित्ते नराधमाः ॥ ३३ ॥ इति संचिन्त्य पृच्छायै तन्वानावसरं ततः । अकालकल्पाभ्ररवं हासं संयम्य साब्रवीत् ॥ ३४ ॥ कौ भवन्तौ नरौ धीरौ कथ्यतामिति मेऽनघौ । जायते दर्शनादेव मैत्री विशदचेतसाम् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

इन लोगों ने मेरा अभिप्राय जान लिया और मैंने इनका अभिप्राय जान लिया है । इन लोगों का मुझे विनाश नहीं करना चाहिए, ये आत्मज्ञ होने के कारण स्वयं अविनाशी हैं। निश्चय ये लोग आत्मज्ञानी होंगे, मिथ्यात्व के निश्चय से जीवनमरणव्यवहार का जिसने त्याग कर दिया है, ऐसे आत्मज्ञानी के सिवा दूसरे पुरुष की बुद्धि मृत्युतुल्य भय के उपस्थित होने पर इस प्रकार निर्भय नहीं हो सकती ॥ ३१, ३ २॥ इसलिए जो मुझे कुछ सन्देह हुआ है, उसे इनसे पूछती हूँ । जो लोग विद्वान पुरुष को पाकर अपने सन्देह के निराकरण के लिए उससे प्रश्न नहीं करते वे अधम पुरुष हैं, ऐसा विचार कर प्रश्न के लिए अवसर खोजती हुई वह अकाल में प्रलय के मेघ के निर्घोष के समान अपने हास को रोककर बोली