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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verses 6–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 78, verses 6–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 6-8

संस्कृत श्लोक

सिंहवत्सर्ववेगेन पतन्त्यर्थे किलार्थिनः । त्यज संरम्भमारम्भं स्वसामर्थ्य प्रदर्शय ॥ ६ ॥ किं प्रार्थयसि मे ब्रूहि ददामि तव सुव्रत । किं वा संरम्भशब्दाभ्यां भीषयास्मान्बिभेषि किम् ॥ ७ ॥ क्षिप्रमाकारशब्दाभ्यां मायया सन्मुखीभव । न किंचिद्दीर्घसूत्राणां सिद्ध्यत्यात्मक्षयादृते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

किसी वस्तु में अभिलाषा रखनेवाले लोग अपनी अभिलाषा के विषय पदार्थपर सिंह के समान पूर्ववेग से टूटते हैं। अपने क्रोध को छोड़ो, भीषण कार्यवाली अपनी शक्ति को दर्शाओ | हे सुव्रत, तुम क्या चाहते हो ? कहो, मैं तुमको तुम्हारी अभीष्ट वस्तु देता हूँ अथवा कोपपूर्ण शब्दों से या विभीषिका से क्या प्रयोजन है ? या तुम्हीं हमसे डरते हो ? तुम शीघ्र दूसरे को दिखाई देनेवाले शरीर की कल्पना करनेवाली शक्ति से अपनी आकृति और शब्द के साथ हमारे सामने खड़े होओ, जो लोग शीघ्र कार्य नहीं कर सकते, उनका आत्मनाश के सिवा और कुछ सिद्ध नहीं होता