Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 79, Verses 13–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 79, verses 13–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 13-18
संस्कृत श्लोक
स्वस्थेन जीवितेनोच्चैः केनात्मैवापहारितः ।
केनाणुनान्तः क्रियते मेरुस्त्रिभुवनं तृणम् ॥ १३ ॥
केनाप्यणुकमात्रेण पूरिता शतयोजनी ।
कोऽणुरेव भवन्माति न योजनशतेष्वपि ॥ १४ ॥
केनालोकनमात्रेण जगद्वालः प्रनाट्यते ।
कस्याणोरुदरे सन्ति किलावनिभृतां घटाः ॥ १५ ॥
अणुत्वमजहत्कोऽणुर्मेरोः स्थूलतराकृतिः ।
वालाग्रशतभागात्मा कोऽणुरुच्चैः शिलोच्चयः ॥ १६ ॥
कोऽणुः प्रकाशतमसां दीपः प्रकटनप्रदः ।
कस्याणोरुदरे सन्ति समग्रानुभवाणवः ॥ १७ ॥
कोऽणुरत्यन्तनिःस्वादुरपि संस्वदतेऽनिशम् ।
केन संत्यजता सर्वमणुना सर्वमाश्रितम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
किसने स्वस्थ
ओर जीवित होते हुए भी अपने आत्मा का अत्यन्त विस्मरण कर दिया ? कौन अणु अपने
भीतर मेरु को धारण करता हे ? कौन त्रिभुवन को तृण बनाता है ? किस अणुपरिमाण ने सौ
योजन पृथ्वी को पूर्ण कर दिया ? कौन अणु होता हुआ ही सैकड़ों योजनों में भी नहीं समा
सकता ? कौन केवल अपने दृष्टिपात से जगत्रूपी बालक को नचाता है या किस अणु के
अन्दर पर्वतों के समूह विद्यमान हैं कौन अपनी अणुताका त्याग न करता हुआ मेरुू से भी
बढ़कर स्थूल आकृति धारण करता है ? बाल के अग्रभाग के शतांश स्वरूपवाला कौन अणु
उन्नत पर्वत के सदश बन जाता है ? कौन अणु प्रकाश और अन्धकार को प्रकट करनेवाला
दीपक है ? किस अणु के उदर में सम्पूर्ण वृत्तिअवच्छिन्न ज्ञान के लव हैं कोन अणु मधुर
आदि रससे रहित होता हुआ भी सदा स्वाद देता है, सबका त्याग करते हुए किस अणुने सब
वस्तुओं का स्वीकार कर रक्खा है ?