Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 8, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 8, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

श्रूयमाणे हि शास्त्रेऽस्मिञ्छ्रोता वेत्त्येतदात्मना । यथावदिदमस्माभिर्ननूक्तं वरशापवत् ॥ १६ ॥ नश्यति संसृतिदुःखमिदं ते स्वात्मविचारणया कथयैव । नो धनदानतपःश्रुतवेदैस्तत्कथनोदितयत्नशतेन ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस शास्त्र के सुनने पर श्रोता पुरुष जीवन्मुक्ति का स्वयं ही अनुभव करता है, यह जो हमने कहा है, वह वर और शाप के समान यथार्थ ही है, अन्यथा नहीं हो सकता है, यह भाव है । हे रामजी, प्रस्तुत ग्रन्थ की आत्मविचारात्मक कथा से ही आपका यह संसाररूपी क्लेश नष्ट हो जायेगा । धन, दान, तपस्या, द्वैतशास्त्रों के श्रवण, कर्मकाण्डरूप वेद और द्वैतवेदशास्त्ररूप वाक्यप्रबन्ध से उक्त यज्ञ, याग, होम आदि सैकड़ों प्रयत्नो से भी आपका यह संसाररूप क्लेश नष्ट नहीं होगा