Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 8, Verses 2–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 8, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
बहुकालमियं रूढा मिथ्याज्ञानविषूचिका ।
जगन्नाम्न्यविचाराख्या विना ज्ञानं न शाम्यति ॥ २ ॥
वदाम्याख्यायिका राम या इमा बोधसिद्धये ।
ताश्चेच्छृणोषि तत्साधो मुक्त एवासि बुद्धिमान् ॥ ३ ॥
नो चेदुद्वेगशीलत्वादर्धादुत्थाय गच्छसि ।
तत्तिर्यग्धर्मिणस्तेऽद्य न किंचिदपि सेत्स्यति ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, यह मिथ्याज्ञानरूपी विषूचिका चिरकाल
से बद्धमूल हे, इसीका नाम जगत् ओर अविचार है, यह ज्ञान के बिना निवृत्त नहीं होती मैं
आपसे बोध की प्राप्ति के लिए आगे कही जानेवाली जिन विविध आख्यायिकाओं को कहँँगा,
हे साधो, उनको यदि आप सुनेंगे तो आप अवश्य मुक्त हो जायेंगे, इसमें संशय नहीं है । यदि
नसुनेंगे, उद्विग्न स्वभाववाले होने के कारण बीच में ही उठकर चले जायेंगे, तो पशुओंकी नाई
सतृशास्त्रके श्रवण में अयोग्यतावाले आपको कुछ भी प्राप्त नहीं होगा