Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 8, Verses 5–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 8, verses 5–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 5-14
संस्कृत श्लोक
योऽयमर्थं प्रार्थयते तदर्थं यतते तथा ।
सोऽवश्यं तदवाप्नोति न चेच्छ्रान्तो निवर्तते ॥ ५ ॥
साधुसंगमसच्छास्त्रपरो भवसि राम चेत् ।
तद्दिनैरेव नो मासैः प्राप्नोषि परमं पदम् ॥ ६ ॥
श्रीराम उवाच ।
आत्मज्ञानप्रबोधाय शास्त्रं शास्त्रविदां वर ।
किं नाम तत्प्रधानं स्याद्यस्मिञ्ज्ञाते न शोच्यते ॥ ७ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
आत्मज्ञानप्रधानानामिदमेव महामते ।
शास्त्राणां परमं शास्त्रं महारामायणं शुभम् ॥ ८ ॥
इतिहासोत्तमादस्मताद्बोधः प्रवर्तते ।
सर्वेषामितिहासानामयं सार उदाहृतः ॥ ९ ॥
श्रुतेऽस्मिन्वाड्मये यस्माज्जीवन्मुक्तत्वमक्षयम् ।
उदेति स्वयमेवात इदमेवातिपावनम् ॥ १० ॥
स्थितमेवास्तमायाति जगद्दृश्यं विचारणात् ।
यथा स्वप्ने परिज्ञाते स्वप्नादावेव भावना ॥ ११ ॥
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ।
इमं समस्तविज्ञानशास्त्रकोशं विदुर्बुधाः ॥ १२ ॥
य इदं श्रृणुयान्नित्यं तस्योदारचमत्कृतेः ।
बोधस्यापि परं बोधं बुद्धिरेति न संशयः ॥ १३ ॥
यस्मै नेदं त्वरुचये रोचते दुष्कृतोदयात् ।
विचारयतु यत्किंचित्सच्छास्त्रं ज्ञानवाङ्मयम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
निवृत्त हो जाता है, वैसे ही इस शास्त्र के विचार से यथास्थित ही दृश्य जगत् अस्त को प्राप्त
हो जाता हे । आत्मबोध के लिए अपेक्षित जो जो उत्कृष्ट युक्तियाँ इस ग्रन्थ में हैं, वे दूसरे ग्रन्थ
में नहीं है । जो यहाँ पर नहीं है, वह कहीं भी नहीं है । इसीलिए विद्वान् जन इसको सम्पूर्ण
विज्ञान शास्त्ररूपी धनों का कोशगृह (खजाना) कहते हैं। जो पुरूष नित्य इसका श्रवण करता
है, उस उत्कृष्ट बुद्धिवाले पुरुष की बुद्धि अन्य ग्रन्थों के अभ्यास से उत्पन्न बोध की अपेक्षा
उत्कृष्ट बोध को प्राप्त होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है । दुर्भाग्यवश जिस पुरुष को यह
शास्त्र रुचिकर नहीं होता, वह ज्ञान का प्रतिपादन करनेवाले अन्य किसी शास्त्र का विचार
करे, इसमें हमारा कोई द्वेष नहीं है