Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
इमाश्चित्तमहाम्भोधौ त्रिजगल्लववीचयः ।
प्रज्ञास्तस्मिन्कचन्त्यप्सु द्रवत्वाच्चक्रता इव ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जलराशि से ऊर्मियाँ (लहरें) पथक् नहीं हैं, वैसे ही किससे यह जगत् पृथक् नहीं है,
इस प्रश्न का उत्तर देते हैं।
चित्तरूप होने से विकारी उस चेतनरूपी महासागर में चित्त-विकल्पस्वरूप ये त्रिजगद्रूपी
तरंगें ऐसे स्फुरित हो रही है जैसे कि द्रव होने के कारण जल में आवर्तं स्फुरित होते हैं। इससे
“कस्येच्छया पृथक् चाऽस्ति" इस प्रश्न का उत्तर भी हो गया